‘हमारी फिल्म इंडस्ट्री शापित है….’ सुरेश वाडकर ने ऐसा क्यों कहा? कहानी जिंदगी की

यह कहानी जीवन की है, जिसमें सुरेश वाडकर का उल्लेख है, जो लगभग पांच दशकों से अपनी गायकी के माध्यम से लाखों लोगों के दिलों को छू रहे हैं। वह केवल एक उत्कृष्ट गायक नहीं हैं, बल्कि एक गुरु, विचारशील संगीतकार और समाज के प्रति संवेदनशील व्यक्ति भी हैं।

7 अगस्त 1955 को जन्मे सुरेश वाडकर के पिता, ईश्वर वाडकर, कपड़ा मिलों में कार्यरत थे, जबकि उनकी माता मिल के श्रमिकों के लिए भोजन तैयार करती थीं।

बचपन में, सुरेश अपने पिता के साथ अखाड़ों में कुश्ती सीखने जाते थे, लेकिन संगीत ने उन्हें एक अलग दिशा दिखाई। आठ वर्ष की आयु से, उन्होंने पंडित जियालाल वसंत से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करना प्रारंभ किया।

करियर की शुरुआत मुंबई से 1968 में, 13 वर्ष की आयु में, उनके गुरु ने उन्हें प्रयाग संगीत समिति का “प्रभाकर” प्रमाणपत्र प्राप्त करने की सलाह दी, जिसने उन्हें पेशेवर रूप से संगीत सिखाने की योग्यता प्रदान की।

इसके पश्चात, उन्होंने मुंबई के आर्य विद्या मंदिर में संगीत शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। सुरेश वाडकर की गायकी का वास्तविक जादू 1976 में प्रकट हुआ, जब उन्होंने सुर-श्रृंगार प्रतियोगिता में भाग लिया और मदन मोहन पुरस्कार जीता। इस विजय ने उनके लिए हिंदी फ़िल्मों में गाने का मार्ग प्रशस्त किया।

संगीतकार रवींद्र जैन ने उन्हें 1977 की फ़िल्म पहेली में “सोना करे झिलमिल झिलमिल” गाने का अवसर प्रदान किया, जो उनकी पहली प्रमुख सफलता थी। इसके उपरांत, 1978 में गमन फ़िल्म की ग़ज़ल “सीने में जलन, आँखों में तूफ़ान सा क्यों है” ने उन्हें एक गंभीर और कुशल गायक के रूप में स्थापित कर दिया।

सुरेश वाडकर ने गाए है अनेक गाने

सुरेश वाडकर ने हिंदी, मराठी, भोजपुरी, उड़िया, कोंकणी और तमिल सहित अनेक भाषाओं में गाने गाए हैं। उनके कुछ प्रमुख गीत हैं: प्रेम रोग (1982) का “मोहब्बत है क्या चीज़”, सदमा (1983) का “ऐ ज़िंदगी गले लगा ले”, परिंदा (1989) का “तुमसे मिलके” और चाँदनी (1989) का “लगी आज सावन की”।

उन्होंने मराठी सिनेमा में भी उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की, विशेषकर “हे भास्कर क्षितिजवरी या” (मी सिंधुताई सपकाल, 2010) के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। लता मंगेशकर, आशा भोसले, अनुपमा देशपांडे और अनुराधा पौडवाल जैसे प्रतिष्ठित गायिकाओं के साथ उनके युगल गीतों ने भी प्रशंसा अर्जित की। राम तेरी गंगा मैली (1985) का “हुस्न पहाड़ों का” और मासूम (1983) का “हुज़ूर इस कदर” जैसे गाने सदाबहार हैं।

उन्होंने संगीत के संदर्भ में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि “हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री क्यों शापित है? और क्यों वह प्रगति नहीं कर पा रही है?”

सुरेश वाडकर म्यूज़िक अकादमी में संगीत शिक्षा प्रदान करते हैं। उनकी उपलब्धियों में 2018 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2020 का पद्मश्री, और 2004 का लता मंगेशकर पुरस्कार सम्मिलित हैं।

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